ऐसे मौसम में सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई बीमारियों के शुरुआती लक्षण एक जैसे हो सकते हैं। बुखार, शरीर दर्द, कमजोरी और सिरदर्द जैसी शिकायतें अलग-अलग संक्रमणों में दिखाई दे सकती हैं।
इसलिए केवल लक्षण देखकर स्वयं यह तय कर लेना कि मरीज को डेंगू, मलेरिया, वायरल फ्लू या कोई दूसरी बीमारी है, सही तरीका नहीं है।
दिल्ली में H1N1 के 1,449 मामले सामने आने की मौजूदा रिपोर्ट भी यही बताती है कि बुखार और सांस संबंधी लक्षणों को केवल सामान्य मौसमी समस्या मानकर छोड़ना उचित नहीं है।
बारिश के बाद जमा साफ या गंदा पानी मच्छरों के प्रजनन के लिए अनुकूल परिस्थिति पैदा कर सकता है। इसलिए घर की छत, कूलर, गमले, टायर, बाल्टी और आसपास ऐसी जगहों की नियमित जांच जरूरी है जहां पानी लंबे समय तक जमा रहता हो।
इसी तरह दूषित पेयजल पेट और आंतों से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है। पीने के पानी की स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
बच्चों और बुजुर्गों में dehydration की स्थिति जल्दी गंभीर हो सकती है। लगातार उल्टी या दस्त होने पर शरीर में पानी और आवश्यक salts की कमी हो सकती है।
लेकिन उपचार का निर्णय मरीज की उम्र और स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर डॉक्टर को करना चाहिए।
मानसून में दूसरी बड़ी सावधानी दवाइयों को लेकर है। वायरल बुखार मानकर स्वयं antibiotic शुरू करना उचित नहीं है। Antibiotics केवल bacterial infections के लिए उपयोगी होते हैं और उनका अनावश्यक इस्तेमाल antimicrobial resistance की गंभीर समस्या को बढ़ा सकता है।
भारत के स्वास्थ्य तंत्र में antimicrobial resistance को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर कार्ययोजना भी लागू है। स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय की मौजूदा जानकारी में National Action Plan on AMR 2025–2029 का उल्लेख है।
इसलिए मरीजों को डॉक्टर की सलाह के बिना antibiotic शुरू या बंद नहीं करनी चाहिए।
यदि बुखार कई दिनों तक बना रहे, सांस लेने में परेशानी हो, मरीज अत्यधिक सुस्त हो जाए, बार-बार उल्टी हो, शरीर में पानी की कमी के संकेत दिखाई दें या कोई अन्य गंभीर लक्षण हो तो चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है।